नागर शैली | Nagar Shaili | Nagar Shaili UPSC In Hindi | Nagar Shaili ( UPSC Notes ) In Hindi

 

Nagar Shaili (नागर शैली) | Nagar Shaili UPSC In Hindi

भारत में मंदिरो का निर्माण मुख्य रूप से नागर शैली और द्रविड़ शैली के अनुरूप सदियों से किया आता रहा है। अभी वर्तमान में अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण भी इसी उत्तर भारतीय मंदिर निर्माण शैली Nagar Shaili (नागर शैली) के अनुरूप हो रहा है।  

आज के इस लेख के माध्यम से हमारा प्रयास ७वी से १३वी शताब्दी में निर्मित मंदिरों में उपयोग उत्तर भारतीय मंदिर निर्माण शैली Nagar Shaili (नागर शैली) जिसका उपयोग वर्तमान में अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण में किया जा रहा है, उसी के बारे में आपको विस्तार से बताने का है। 

इस लेख में हम जानेंगे मंदिर स्थापत्य की उत्तर भारतीय मंदिर निर्माण शैली Nagar Shaili (नागर शैली) क्या है?

Nagar Shaili (नागर शैली) से निर्मित मंदिरो के बारे में। 

 

 

Nagar Shaili (नागर शैली) क्या है ?

 

मंदिर स्थापत्य की इस शैली का विकास हिमालय से लेकर विंध्य क्षेत्र तक हुआ नागर स्थापत्य के मंदिर मुख्यता नीचे से ऊपर तक आयताकार रूप में निर्मित होते हैं। उत्तर भारत में मदिंर स्थापत्य/वास्तुकला की जो शैली लोकप्रिय हुई उसे नागर शैली कहा जाता है। इस शैली की एक आम बात यह थी कि सम्पूर्ण मंदिर  एक विशाल चबूतरे (वेदी) पर बनाया जाता है और उस तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ होती हैं। 

सामान्य: उत्तर भारतीय मंदिर शैली में मंदिर एक वर्गाकार गर्भ-ग्रह, स्तंभों वाला मंडल तथा गर्भ-गृह के ऊपर एकरेखीय शिखर से संयोजित होता है मंदिर एक ऊंचे चबूतरे पर स्थापित होता है जिसे “जगती” कहते हैं तथा जिस पर जाने के लिए कभी-कभी तीनों ओर से तथा कभी-कभी एक ओर से सीढ़ियां बनी होती है

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नागर शैली में बने मंदिरों के गर्भ-ग्रह के ऊपर एक रेखीय शिखर होता हैयह तीनों भागों में संलग्न होता है, जिसमें सबसे मध्य के उभार को “भद्ररथ” कहा जाता है तथा सबसे किनारे वाले उभार को “कर्नरथ” कहा जाता हैं।  भद्ररथ तथा कर्नरथ के मध्य के उभार को “प्रतिरथ” की संज्ञा दी गयी है शिखर का सबसे महत्वपूर्ण भाग सबसे ऊपर लगा आमलक (अम्लसारक) होता है, जो उत्तरी भारत के मंदिरों एवं नागर शैली मुख्य पहचान है। 

 

 

Nagar Shaili (नागर शैली) में निर्मित मंदिरों की विशेषताएं  

 

  • नागर शैली में शिखर अपनी ऊंचाई के क्रम में ऊपर की ओर क्रमशः पतला होता है। 
  • मंदिर में सभा भवन और प्रदक्षिणा पथ अवश्य रूप से निर्मित होता है। 
  • शिखर के नियोजन में बाहर की रूपरेखा स्पष्ट तथा प्रभावशाली ढंग से विद्यमान होती है जिस कारण  इसे “रेखाशिखर” भी कहते हैं। 
  • शिखर पर आमलक की स्थापना होती है। 
  • वर्गाकार तथा ऊपर की ओर वक्र रुपी शिखर इसकी विशेषता है। 
  • नागरशैली में एक दसरा प्रमुख वास्तुरूप है फमसाना किस्म केभवन, जो रेखाशिखर
    की तुलना में अधिक चौड़े और ऊँचाई में कुछ छोटे होते हैं। इनकी छतें अनेक ऐसी शिलाओ की बनी होती हैं, जो भवन के केंद्रीय भाग केऊपर एक निश्चित बिंदु में जुडी होती है। 
  • वलभी, नागर शैली की उपश्रेणी कहलाती है। इस श्रेणी के मंदिर वर्गाकार आकार के होते है। 

 

 

नागर शैली के मंदिर की संरचना 

 

नागर शैली के मंदिर संरचना की तुलना मानव शरीर के विभिन्न अंगों से की गई है मानव शरीर की संरचना के समान ही मंदिर की संरचना पर बल दिया गया है इसे निम्न तथ्यों के आधार पर देखा जा सकता है :-

  • मानव शरीर का सारा भार जिस अंग पर टिका होता है वह पैर है इसी प्रकार नागर शैली में संपूर्ण मंदिर का भाग जिस पर टिका रहता है उसे “पाद-अधिष्ठान” या “जगती पीठ” कहते हैंइसे सामान्य भाषा में “चबूतरा” कहते हैं जो कि कुछ ऊंचाई पर स्थित होता है। 
  • शरीर के अन्यतम भीतरी गुप्त क्षेत्र को “कटि प्रदेश” कहते हैं। इसी प्रकार मंदिर का अन्यतम भीतरी  गुप्त क्षेत्र “गर्भ-ग्रह” कहलाता है। 
  • कमर के ऊपर शरीर के आंतरिक विस्तृत क्षेत्र को “उदर” कहते हैं मंदिर के आंतरिक विस्तृत क्षेत्र को “विमान” कहते हैं। 
  • शरीर का बाह्य विस्तृत क्षेत्र स्कंध वक्ष है और मंदिर के बाहर स्थित विस्तृत क्षेत्र को शिखर कहते हैं
  • शरीर के ऊपर  गोलाई लिए हुए भाग को गर्दन कहते हैं मंदिर का ऊपरी गोलाई वाला भाग ग्रीवा या शुकनासिका कहलाता है। 
  • शरीर का सबसे ऊपरी हिस्सा सिर है वैसे ही मंदिर का सबसे ऊपरी हिस्सा “आमलक स्तूप” है

 

नागर शैली की उपशैलियाँ 

 

नागर शैली संपूर्ण उत्तर भारत पर प्रभावी रही है, इसलिए उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों की अपनी स्थानीय विशेषता के साथ उसकी उपशैलियाँ भी बढ़ती गई। नागर शैली में प्रयुक्त उपशैलियाँ निम्नवत है :- 

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  • उड़िया उपशैली – ओड़िशा
  • अंतर्वेदी उपशैली – उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली
  • खजुराहो उपशैली – मध्यप्रदेश
  • चालुक्य / सोलंकी उपशैली – गुजरात एवं दक्षिण राजस्थान
  • कश्मीरी उपशैली – कश्मीर

क्षेत्रीय शैलियों में निर्मित मंदिरों को ओड़िशा में “कलिंग” , गुजरात में “लाट” और हिमालय क्षेत्र में “पर्वतीय” कहा जाता है। 

 

 

नागर शैली से निर्मित कुछ प्रमुख मंदिर 

 

  • देवगढ़ का मंदिर : 

इस मंदिर को छठी शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में बनाया गया था। यह उत्तर प्रदेश में स्थित है। इसका मतलब
यह है कि यह मंदिर उपयुक्त साँची और उदयगिरि (मध्य प्रदेश) के छोटे मंदिरों के लगभग 100 साल बाद बना था। इसलिए इसे गुप्तकालीन मंदिर स्थापत्य का एक श्रेष्‍ठ उदाहरण माना जाता है।

यह मंदिर वास्तुकला की पंचायतन शैली में निर्मित है जिसके अनसार मुख्य देवालय को एक वर्गाकार वेदी पर बनाया जाता है और चार कोनों में चार छोटे सहायक देवालय बनाए जाते हैं। (इस प्रकार कुल मिलाकर
पाँच छोटे-बड़े देवालय बनाए जाते हैं इसीलिए इस शैली को पंचायतन शैली कहा जाता है। इसका ऊँचा और वक्ररेखीय शिखर रेखा-शिखर शैली पर बना है जिससे यह स्पष्‍ट होता है कि यह मंदिर श्रेष्‍ठ नागर शैली उदाहरण है।

 

  • पश्‍चिमाभिमुख मंदिर : 

इस मंदिर का प्रवेश द्वार बहुत भव्य है। इसके बाएँ कोने पर गंगा और दाएँ कोने पर यमुना है। इसमें विष्णु भगवान के अनेक रूप प्रस्तुत किए गए हैं, जिसके कारण लोगों का यह मानना है कि इसके चारों उप- देवालयों में भी विष्णु के अवतारों की मुर्तिया ही स्थापित थीं। इसीलिए लोग इसे भ्रमवश दशावतार मंदिर समझने लगे।

 

  • खजुराहो का लक्ष्मण मंदिर :

यह मंदिर विष्णु भगवान को समर्पित है। यह मदिंर चंदेल वंशीय राजा धंग द्वारा 954 ई. में बनाया गया था। नागर शैली में निर्मित यह मदिंर एक ऊँची वेदी (प्लेटफार्म) पर स्थित है। और उस तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। इसके कोनों में चार छोटे देवालय बने हैं और इसके गगनचुम्बी शिखर पिरामिड की तरह सीधे आकाश में खड़े हुए है। इसके शिखर के अंत में एक नालीदार चक्रिका (तश्तरी) है जिसे आमलक कहा जाता है। और उस पर एक कलश स्थापित है। ये सब चीजें इस काल के नागर मदिंरों में सर्वत्र पाई जाती हैं।

 

  • खजुराहो स्थित कंदरिया महादेव मंदिर : 

खजुराहो के मंदिरो में सबसे श्रेष्ठ कंदरिया महादेव मंदिर है। खजुराहो स्थित कंदरिया महादेव मंदिर का निर्माण भारतीय मंदिर स्थापत्य शैली की पराकाष्‍ठा है। इस विशाल मदिंर के स्‍थापत्‍य एवं मूर्तिकला में मध्‍य कालीन भारतीय मंदिर निर्माण के वे सभी लक्षण विद्यमान हैं जिनके लिए मध्‍य भारत की स्‍थापत्‍य कला की श्रेष्‍ठता जानी जाती है। खजुराहो के मदिंर अपनी कामोद्दीप एवं श्रृंगार प्रधान प्रतिमाओं के लिए भी बहुत प्रसिद्ध हैं। इनमें श्रृंगार रस को उतना ही महत्व दिया गया है जितना कि मानव की आध्यात्मिक खोज को। इस मंदिर में शिखर और अलंकरणों की अपनी एक विशिष्ट पहचान है।

इस मंदिर में पहुंचने के लिए सीढ़ियों से होकर १३ ऊंचे चबूतरों पर चढ़ना होता है। गर्भ-गृह अंत में सबसे ऊंचाई पर बना हुआ है। मंदिर में मुख्य प्रतिमा कंदरिया महादेव की है। मंदिर के उत्तरी, दक्षिणी, पश्चिमी कोनो पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवताओ की प्रतिमाये स्थापित है।

 

  • गुजरात का सूर्य मंदिर :

मोढ़ेरा (गुजरात) का सुर्यमदिंर ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभिक काल की रचना है। इसे सोलंकी राजवंश के राजा भीमदेव प्रथम ने 1026 ई. में बनाया था। सूर्यमदिंर में सामने की ओर एक अत्यंत विशाल वर्गाकार जलाशय है जिसमें सीढ़ियों की सहायता से पानी तक पहुँचा जा सकता है। इसे सूर्यकुंड कहते हैं। नदी, तालाब, कुंड जैसे किसी भी जल निकाय का किसी पवित्र एवं धार्मिक वास्तु स्थल के पास होना पुराने जमाने से ही आवश्यक समझा जाता रहा है। इस काल तक आते-आतेये जल निकाय अनेक मदिंरों के हिस्से बन गए। यह एक सौ वर्गमीटर के क्षेत्रफल वाला वर्गाकार जलाशय है। जलाशय के भीतर की सीढ़ियों के बीच में 108 छोटे-छोटे देवस्थान बने हुए हैं।

 

  • कोणार्क का सूर्य मंदिर :

बंगाल की खाड़ी के तट पर कोणार्क में भव्य सूर्य मदिंर स्थित है। यह मदिंर 1240 ई. के आस-पास बनाया गया था। इसका शिखर बहुत भारी-भरकम था और उसकी ऊँचाई 70 मीटर थी। इसका स्थल इसके
भार को न सह सका और यह शिखर उन्नीसवीं शताब्दी में धराशायी हो गया। मदिंर का विस्तृत संकुल एक चौकोर परिसर के भीतर स्थित था।

सूर्य मंदिर एक ऊँचे आधार (वेदी) पर स्थित है। इसकी दीवारें व्यापक रूप से आलंकारिक उत्कीर्णन
से ढकी हुई हैं। इनमें बड़े-बड़े पहियों के 12 जोड़े हैं; पहियों में आरे और नाभिकेंद्र (हब) हैं जो सूर्य देव की पौराणिक कथा का स्मरण कराते हैं। जिसके अनुसार सूर्य देव सात घोड़ों द्वारा खींचे जा रहे रथ पर सवार होते हैं। यह सब प्रवेश द्वार की सीढ़ियों पर उकेरा हुआ है। इस प्रकार यह सम्पूर्ण मंदिर किसी शोभायात्रा में खींचे जा रहे विशाल रथ जैसा प्रतीत होता है। मंदिर की दक्षिणी दीवार पर सूर्य की एक विशाल प्रतिमा है जो हरे पत्थर की बनी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि पहले ऐसी तीन आकृतियाँ थीं; उनमें से हर एक आकृति एक अलग किस्म के पत्थर पर बनी हुई अलग-अलग दिशा की ओर अभिमुख थी। चौथी दीवार पर मंदिर के भीतर जाने का दरवाजा बना हुआ था, जहाँ से सूर्य की वास्तविक किरणें गर्भ-गृह में प्रवेश करती थीं।

 

  • अल्मोड़ा का जागेश्वर मंदिर :

उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के दौरान हिमालय की पहाडियों के कुमाऊं क्षेत्र में कत्यूरीराजाओं का राज था। जागेश्वर मंदिर समूह का निर्माण भी उसी काल में हुआ, इसी कारण मंदिरों में गुप्त साम्राज्य की झलक भी दिखायी देती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार इन मंदिरों के निर्माण की अवधि को तीन कालों में बांटा गया है:- ” कत्यूरीकाल, उत्तर कत्यूरीकाल एवं चंद्र काल” बर्फानी आंचल पर बसे हुए कुमाऊं के इन साहसी राजाओं ने अपनी अनूठी कृतियों से देवदार के घने जंगल के मध्य बसे जागेश्वर में ही नहीं वरन् पूरे अल्मोडा़ जिले में चार सौ से अधिक मंदिरों का निर्माण किया।

यह मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगो में एक है, जिसे जगद्गुरु शंकराचार्य ने अपने भ्रमण के दौरान इसकी मान्यता को पुनर्स्थापित किया था । इस मंदिर समुह के मध्य में मुख्य मंदिर में स्थापित शिव लिंग को श्री नागेश ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है, इसी नाम का एक और ज्योतिर्लिंग द्वारिका के पास भी स्थापित है, जिसे श्री नागेश ज्योतिर्लिंग के रूप में भी मान्यता प्राप्त है।

 

Nagar Shaili | Nagar Shaili (नागर शैली) क्या है ? नागर शैली से निर्मित कुछ प्रमुख मंदिर | नागर शैली

 

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